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By JagranNews
भूजल स्तर के बढ़ने में बारिश के पानी का योगदान सबसे ज्यादा होता है। यानी वर्षा ऋत

भूजल स्तर के बढ़ने में बारिश के पानी का योगदान सबसे ज्यादा होता है। यानी वर्षा ऋतु में मिलने वाला पानी जितना ज्यादा जमीन की गहराई में समाएगा, भूजल स्तर उतना ज्यादा बढ़ेगा। लेकिन इस मामले में पिछले कुछ वर्षों में मानसूनी बारिश की दर में गिरावट ने उत्तर प्रदेश के हालात बिगाड़ दिए हैं।

दरअसल, बीते कुछ वर्षों में भारत के कई हिस्सों में बारिश मौसम में मिलने वाले पानी की मात्रा लगातार घटी है। यह रुझान ग्रीष्म मानसून में खास तौर पर देखा गया है।

ग्रीष्म मानसून का गणित

ग्रीष्म मानसून का गणित

आम तौर पर अप्रैल से सितंबर के बीच आने वाले इस ग्रीष्म मानसून का संबंध भारी बारिश से है। ठंड का मौसम खत्म होते ही दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर से गर्म और नम हवा भारत, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यान्मार जैसे देश की ओर बहती है। ग्रीष्म मानसून के दौरान इन क्षेत्रों में अक्सर नम जलवायू के बीच मूसलाधार बारिश होती है। लेकिन उत्तर प्रदेश की बात करें तो मानसूनी बारिश के मामले में इस सूबे का प्रदर्शन कमजोर रहा है।

लगातार घटती बारिश

लगातार घटती बारिश

साल 2017 में उत्तर प्रदेश में मानसूनी बारिश में सर्वाधिक कमी दर्ज हुई है। दुर्भाग्यवश, महज 2017 में ही नहीं, बीते आठ वर्षों से उत्तर प्रदेश में मानसून की बारिश सामान्य से कम दर्ज हो रही है। बीते साल उत्तर प्रदेश में 28 फीसद कम बारिश हुई जबकि यही घाटा साल 2016, 2015 और 2014 में क्रमशः 14 फीसद, 45 फीसद और 49 फीसद दर्ज हुआ था।

सर्वाधिक प्रभावित जिले

सर्वाधिक प्रभावित जिले

2012 से 2016 के दौरान हुई सालाना बारिश संबंधी आंकड़े बताते हैं कि इन पांच वर्षों में उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में बारिश में कमी दर्ज हुई। इस दौर में बारिश की सर्वाधिक कमी औरय्या, इटावा, फर्रुखाबाद, गौतम बुद्ध नगर, गाजियाबाद, कौशाम्बी, कुशीनगर, महाराजगंज, मैनपुरी, मऊ, पीलीभीत और रामपुर में दर्ज हुई थी। इनमें से भी चार जिले- गौतम बुद्ध नगर, गाजियाबाद, कौशाम्बी और कुशीनगर ऐसे हैं जहां न्यूनतम वर्षा दर्ज हुई।

इन तथ्यों से पता चलता है उत्तर प्रदेश में जमीन के ऊपर और भीतर पानी की मौजूदगी को लेकर स्थिति कितनी चिंताजनक है।

बारिश में कमी की असली वजह

बारिश में कमी की असली वजह

रिसर्च के मुताबिक बीते वर्षों के दौरान बारिश की कमी के विभिन्न कारण सामने आए हैं। जलवायु परिवर्तन और इसकी वजह से महासागरों के गर्म होने के कारण सारी दुनिया में मौसमी बारिश के स्वरूप में बदलाव आया है।

2016 में पॉल एस और उनके साथियों का एक हालिया शोध ऑनलाइन जर्नल ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित हुआ है। यह शोध धरती की सतह के इस्तेमाल और इस पर मौजूद खेत-जंगल के हालातों के भारत में ग्रीष्म मानसून पर होने वाले असर से संबंधित है। इस शोध के मुताबिक समुद्री सतह के अलावा धरती पर मौजूद पेड़-पौधे वातावरण में वाष्पन-उत्सर्जन की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। जंगलों की कटाई के कारण अब पेड़-पौधों की नमी भाप बन कर वातावरण में कम मात्रा में पहुंच रही है। नतीजतन, भारत में ग्रीष्म मानसून की बारिश में कमी हुई है।

संकट का यह है समाधान

संकट का यह है समाधान

ऐसे में लंबी अवधि तक बारिश की समुचित मात्रा सुनिश्चित करने के लिए वन्य क्षेत्र का विस्तार और अन्य क्षेत्रों में भी पेड़-पौधों की संख्या बढ़ाना जरूरी है। साथ ही यह पक्का करना भी जरूरी है कि बारिश का पानी ज्यादा से ज्यादा मात्रा में धरती के भीतर गहराई में समा सके। इसके अलावा रेन वाटर हार्वेस्टिंग को बढ़ावा देने की जरूरत है। वर्षा जल का संचय एवं संग्रह करके इसके समुचित प्रबंधन को अंग्रेजी में रेन वाटर हार्वेस्टिंग कहा जाता है। जिन इलाकों में जनसंख्या का घनत्व और कंक्रीट का भवन निर्माण ज्यादा है वहां वर्षा जल संचय और उसका उचित प्रबंधन अनिवार्य किया जाना चाहिए।

स्थानीय स्तर पर कोशिश की दरकार

स्थानीय स्तर पर कोशिश की दरकार

हालांकि धरती पर बारिश की मात्रा वैश्विक कारकों पर निर्भर करती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर भी भूजल स्तर में बढ़ोतरी के लिए प्रयासों की आवश्यकता है। भूजल का उचित स्तर बनाए रखने के लिए अन्य साधनों-स्रोतों पर भी विचार करने की जरूरत है। जैसे- वाटरशेड डवलपमेंट यानी पानी के उचित प्रवाह के जल-विभाजक प्रबंधन, स्थानीय स्तर पर जल-संग्रहण और प्रबंधन के लिए पोखरों-तालाबों का निर्माण, स्थानीय जल स्रोतों की साफ-सफाई और पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निगरानी व्यवस्था का संचालन। इन सभी प्रयासों को सफल बनाने के लिए नियामक और नीतिगत कार्यवाही के साथ ही जन-भागीदारी सामुदायिक सतर्कता भी जरूरी है।

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