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By JagranNews
जरा सोचिये, जब भी आप धरती पर एक वर्ग फुट कंक्रीट बिछाते हैं, आप बारिश के पानी के

जरा सोचिये, जब भी आप धरती पर एक वर्ग फुट कंक्रीट बिछाते हैं, आप बारिश के पानी के जमीन में जाने का रास्ता बंद कर देते हैं। असल में यही कीमती जल धरती की गहराई में समा कर कुओं का पेट भरता है। जिन इलाकों में कंक्रीट जंगल पनपता है, वहां लाखों-करोड़ों वर्ग फुट जमीन के भीतर बारिश का पानी नहीं जा पाता। जमीन के भीतर जाने के लिए कहीं भी जगह न मिलने पर यह सारा पानी भाप बन कर आसमान में उड़ जाता है।

उत्तर प्रदेश के सात जिले ऐसे हैं जहां कंक्रीट का जाल फैलने की दर सबसे तेज है। इन जिलों में आंबेड़कर नगर, बलिया, गाज़ीपुर, कुशीनगर, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और वाराणसी शामिल हैं। इन सातों जिलों में एक समानता यह भी है कि ये इनमें वन्य भूमि का क्षेत्र बहुत कम है।

कंक्रीट के तीव्र से विस्तार का पर्यावरण पर कई प्रकार के विपरीत प्रभाव पड़ता हैं, भूजल स्तर में कमी तो इनमें से महज एक नतीजा है। चूंकि कंक्रीट की वजह से धरती की हरियाली गायब हो जाती है, बारिश का पानी धरती की गहराई तक नहीं पहुंच पाता। इसका दुष्परिणाम यह है कि जमीन के भीतर जल स्तर बढ़ने की दर भी घट जाती है।

कंक्रीट से बचाव के तरीके

कंक्रीट से बचाव के तरीके

कंक्रीट की समस्या से निजात पाने का एक तरीका यह है कि नीति संबंधी बदलाव किए जाएं। मसलन, फुटपाथ की जगह छिद्र वाली टाइल्स का इस्तेमाल किया जाए। ये टाइल्स अपने नीचे जमीन के भीतर पानी पहुंचाने में मददगार साबित होंगी। सोशल एक्शन फॉर फोरेस्ट्स ऐंड एन्वाइरन्मन्ट (सेफ) के कार्यकर्ताओं के मुताबिक उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार के उन दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया है जिनके तहत भूजल स्तर बढ़ाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों में छिद्रों वाली टाइल्स के इस्तेमाल की अनुशंसा की गई थी। इन कार्यकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव के समक्ष दिए गए प्रतिवेदन में सार्वजनिक स्थानों पर इन टाइल्स के इस्तेमाल का आग्रह किया था।

तीन जिलों में बढ़ता शहरीकरण, घटता भूजल

तीन जिलों में बढ़ता शहरीकरण, घटता भूजल

जनसंख्या बढ़ने की ऊंची दर के कारण शहरीकरण या शहरों के विस्तार की प्रक्रिया तेज हो जाती है जो साथ ही पर्यावरण संबंधी कई अन्य चुनौतियां भी पेश करती है। बीते करीब 10 साल में उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में से लखनऊ, गौतम बुद्ध नगर (नोएडा और ग्रेटर नोएडा) और गाजियाबाद जिलों में जनसंख्या की बढ़ोतरी सबसे ज्यादा हुई है। उत्तर प्रदेश के पर्यावरण सूचना प्रणाली केंद्र (एनविस सेंटर) के मुताबिक ये तीनों जिले उन शहरी क्षेत्रों में शामिल हैं जहां “भूजल स्तर सबसे ज्यादा गिर चुका है।” जनसंख्या बढ़ते ही खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ती है और इसके साथ-साथ खेती के लिए सिंचाई की जरूरत भी बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में भूजल बढ़ती मांग के बीच उसकी आपूर्ति भी प्रभावित होती है।

जनसंख्या के बढ़ते दबाव के बीच उत्तर प्रदेश के इन तीनों जिलों में घटते जमीनी पानी का हानिकारक तत्वों से दूषित होना भी चिंता का एक बड़ा कारण है। एनविस के मुताबिक विभिन्न क्षेत्रों में फ्लूराइड, लौह, आर्सेनिक, क्रोमियम और मैंगनीज जैसे तत्वों की बड़े पैमाने पर जमा होने की सूचना मिली है।

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